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सावन माह में विशेष : ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग, तीनों लोकों की रोज़ाना परिक्रमा करने के बाद भगवान शिव यहां करते हैं विश्राम

  नई दिल्ली। सावन माह में विशेष की कड़ी में हम आपको भारत में स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में बता रहे हैं। यह शिव शक्ति के वो...

 


नई दिल्ली। सावन माह में विशेष की कड़ी में हम आपको भारत में स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में बता रहे हैं। यह शिव शक्ति के वो 12 पवित्र स्थल हैं, जहां भगवान शिव स्वयंभू प्रकट हुए। इससे पहले, आपने प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ, दूसरे मल्लिकार्जुन और तीसरे महाकालेश्वर के बारे में पढ़ा। आज सावन के पहले सोमवार के दिन आपको बारह ज्योतिर्लिंगों में से चौथे ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर के बारे में अवगत करा रह हैं। 

स्कंद पुराण, शिव पुराण और वायु पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में ओंकारेश्वर की महिमा का वर्णन मिलता है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर, इंदौर से लगभग 77 किलोमीटर दूर स्थित है। यह नदी के उत्तरी तट पर स्थित एकमात्र ज्योतिर्लिंग है । माना जाता है कि तीनों लोकों की रोज़ाना परिक्रमा करने के बाद भगवान शिव यहां विश्राम करते हैं। इसलिए, यहां भगवान शिव के सोने के लिए विशेष इंतज़ाम, अनुष्ठान और ‘शयन दर्शन’ की व्यवस्था की जाती है।

हिंदू परंपराओं के अनुसार, ओंकारेश्वर से अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो इस ज्योतिर्लिंग की धार्मिक महत्ता को रेखांकित करती हैं। एक प्रचलित कथा के अनुसार, विंध्याचल पर्वतमाला के अधिष्ठाता देवता विंध्य ने अपने द्वारा किए गए पापों के प्रायश्चित के लिए भगवान शिव की कठोर आराधना की। उन्होंने एक पवित्र यंत्र की स्थापना की तथा रेत और मिट्टी से एक शिवलिंग का निर्माण कर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव दो ओंकारेश्वर और अमलेश्वर (ममलेश्वर) स्वरूपों में प्रकट हुए। मान्यता है कि जिस स्थान पर मिट्टी का शिवलिंग दिव्य रूप में प्रकट हुआ, वही आगे चलकर ओंकारेश्वर कहलाया।

वहीं, एक अन्य कथा का संबंध इक्ष्वाकु वंश के प्रसिद्ध राजा मंधाता से है, जिन्हें भगवान राम का पूर्वज माना जाता है। कहा जाता है कि राजा मंधाता ने इसी स्थान पर भगवान शिव की घोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर शिव ने ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिए। कुछ परंपराओं में यह भी वर्णित है कि मंधाता के पुत्र अंबरीष और मुचुकुन्द ने भी यहाँ कठोर तप किया था। इसी कारण इस पर्वत और द्वीप को मंधाता पर्वत अथवा मंधाता द्वीप के नाम से भी जाना जाता है। एक अन्य पौराणिक आख्यान के अनुसार, देवताओं और दानवों के बीच हुए भीषण युद्ध में जब दानवों की विजय होने लगी, तब संकटग्रस्त देवताओं ने भगवान शिव की आराधना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और दानवों का संहार कर देवताओं को विजय प्रदान की। इस कथा के कारण भी ओंकारेश्वर को धर्म और अधर्म के संघर्ष में दिव्य संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।

ओंकारेश्वर का संबंध आदि शंकराचार्य के जीवन से भी जुड़ा हुआ है। परंपरा के अनुसार, यहीं स्थित एक गुफा में उनकी भेंट अपने गुरु गोविन्द भगवत्पाद से हुई थी और उन्होंने उनके सान्निध्य में वेदांत का अध्ययन किया। यह गुफा आज भी ओंकारेश्वर मंदिर के निकट विद्यमान है और एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक तीर्थस्थल मानी जाती है। यहां आदि शंकराचार्य की प्रतिमा भी स्थापित है, जो उनके जीवन और अद्वैत वेदांत परंपरा की स्मृति को संजोए हुए है।


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