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सामूहिक समर्पण और पुरुषार्थ से ही राष्ट्र की समृद्धि कायम रहती है : प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर राष्ट्र निर्माण और समृद्धि से जुड़ा एक संस्कृत सुभाषित साझा किया। उन्होंने ...


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर राष्ट्र निर्माण और समृद्धि से जुड़ा एक संस्कृत सुभाषित साझा किया। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति और स्थायी समृद्धि उसके नागरिकों के सामूहिक समर्पण, परिश्रम और कर्तव्यनिष्ठा पर निर्भर करती है। प्रधानमंत्री ने लिखा, “सामूहिक समर्पण और पुरुषार्थ से राष्ट्र की समृद्धि अक्षुण्ण रहती है। यही भावना समाज को नई ऊर्जा देती है और विकास के संकल्पों को सिद्धि तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करती है।”

प्रधानमंत्री ने संस्कृत श्लोक “यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता। नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम्॥” भी साझा किया। इसका अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि जहां लोगों में राष्ट्रहित के लिए उत्साह और कर्मशीलता होती है, जहां आलस्य का स्थान नहीं होता और जहां नीति व साहस का संतुलित मेल होता है, वहां समृद्धि स्थायी रूप से बनी रहती है। त्याग, तप और समर्पण से ही राष्ट्र मजबूत और विकसित बनता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने 23 जून को भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की थी। उन्होंने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र और समाज की सेवा को समर्पित कर दिया। उनके विचार और आदर्श आज भी देश की नई पीढ़ी को मातृभूमि की सेवा के लिए प्रेरित करते हैं। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने यह संस्कृत श्लोक भी साझा किया था, “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः। परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति॥”। इसका भावार्थ है कि अमरत्व केवल कर्म, धन या वंश से नहीं मिलता, बल्कि त्याग, उच्च आदर्शों और निस्वार्थ समर्पण से प्राप्त होता है। जो लोग राष्ट्र, समाज और सत्य के लिए अपने स्वार्थों का त्याग करते हैं, वे समय बीत जाने के बाद भी लोगों के दिलों में जीवित रहते हैं।

प्रधानमंत्री के संदेश का सार यह है कि किसी राष्ट्र की समृद्धि केवल प्राकृतिक संसाधनों या आर्थिक ताकत से नहीं आती, बल्कि उसके नागरिकों की मेहनत, अनुशासन और राष्ट्रहित के प्रति समर्पण से सुनिश्चित होती है। जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करता है, तब देश विकास, आत्मनिर्भरता और गौरव की नई ऊंचाइयों को छूता है। यह सुभाषित हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण किसी एक व्यक्ति या सरकार का काम नहीं है, बल्कि करोड़ों नागरिकों के सामूहिक प्रयास, परिश्रम और एकजुट संकल्प का परिणाम होता है। यही भावना विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने की सबसे बड़ी शक्ति है।

उल्लेखनीय है कि सोमवार को प्रधानमंत्री मोदी ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की सफलता पर भी एक संस्कृत सुभाषित साझा किया था। उन्होंने कहा था कि योग आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों को न केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ बना रहा है, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास और सकारात्मकता के साथ जीवन जीने की प्रेरणा भी दे रहा है।

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